Thursday, 20 November 2014

दी अवशेषो ने दिशा


बूँद बूँद आशाएँ 
टूटती टपकती रही
जीवन व्योम से
रलती मिलती रही
मन मरूस्थल से
और हो चली एकमेक
समय की वायु से
हुआ अपरदन
दिखने लगी खण्डित सतह
उनकी पुनः ।

निष्ठुर प्रकृति का
फिर हुआ कहर
हुआ जल अपरदन
नयनो से
और बह चली
पहुँची दुखो के समुद्र मे।

जमता चला गया जहां अवसाद
कभी भूत कभी वर्तमान का।

तिनका तिनका
चिड़िया गान से
हुई उमंग संचारित
और दी अवशेषों ने दिशा 
युग निर्माण की।

  एकला

8 comments:

  1. तिनका तिनका
    चिड़िया गान से
    हुई उमंग संचारित
    और दी अवशेषों ने दिशा
    युग निर्माण की।

    आशा और विश्वास के स्वर !

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  2. समय की कौन क्या जाने जाने..कब क्या देना है उसे. हाँ आशा है तो निर्माण के बीज है. अलग सी...सुन्दर रचना.

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  3. शुरूआत शुन्य से ही होती है।सुना है अंधेरे को चीरने के लिए जरा-सी चिंगारी काफी है।
    गर आशाएं मन में हैं तो उसे पाने की उमंग और विश्वास स्वयं राह दिखा देते हैं।
    बेहद सुंदर रूप दिया आपने अपने विचारों को,जो आपकी रचना से झलक रहा है।

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  4. बहुत सुन्दर रचना....

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  5. निर्वाण और निर्माण .. दोनों ही तो प्रकृति के हाथ में है ... चिड़िया उन्हें उमंग से लेती है ... काढ मनुष्य भी ऐसा हो हो जाए ... सहज ...

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  6. bahut hi umda.. badhyi is rachna k liye aapko....

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  7. वाह! बहुत ख़ूबसूरत एहसास पिरोये हैं आपने...

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