आंधी खड़ा रहूं मैं और महसूस करूं
तेरे हर कण के रौंदे जाने की व्यथा
नहीं मुझे कोई आश्चर्य
तेरे प्रचण्ड वेग का.
सत्य है यहीं दबा जो जितना गहरा
उठ खड़ा हुआ उतना ही विशाल बनकर
दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर
समझते जो महफूज खुद को
ढहने को करीब उनके महल अब
यही है दस्तक
हर जगह कोने में मिट्टी के छा जाने की.
By
-अनिल दायमा 'एकला'
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नहीं मुझे कोई आश्चर्य
तेरे प्रचण्ड वेग का.
सत्य है यहीं दबा जो जितना गहरा
उठ खड़ा हुआ उतना ही विशाल बनकर
दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर
समझते जो महफूज खुद को
ढहने को करीब उनके महल अब
यही है दस्तक
हर जगह कोने में मिट्टी के छा जाने की.
By
-अनिल दायमा 'एकला'
बहुत सुंदर कविता..
ReplyDeleteshukriya sir G
Deleteबहुत सुंदर भाव !
ReplyDeleteBahut umda bhaw.... !!
ReplyDeleteकितनी ही परेशानी क्यों न आए, सब सह महसूस करूँ तेरी हर व्यथा ।
ReplyDeleteबहुत प्रभावित करती हैं आपकी रचनाएं।
बहूत खूब।