गुनगुनाने लगे हैं गम
दर्द भी
साज सजाने लगे हैं
बुँदे बरसने लगी
आँखों से
बिखरे सपने
इन्द्रधनुष बनाने लगे हैं

गाता जा रहा लम्हा
पल शोर मचाने लगे हैं
बदल गई हर हवा
सूखे पत्ते
कहानी सुनाने लगे हैं
फिर एकला
अपनों की भीड़ मे
बिछुडे याद आने लगे हैं
ढूँढता बहाने
खुशियों के मैं
कि गम
मुस्कुराने लगे हैं।
'एकला'
दर्द भी
साज सजाने लगे हैं
बुँदे बरसने लगी
आँखों से
बिखरे सपने
इन्द्रधनुष बनाने लगे हैं

गाता जा रहा लम्हा
पल शोर मचाने लगे हैं
बदल गई हर हवा
सूखे पत्ते
कहानी सुनाने लगे हैं
फिर एकला
अपनों की भीड़ मे
बिछुडे याद आने लगे हैं
ढूँढता बहाने
खुशियों के मैं
कि गम
मुस्कुराने लगे हैं।
'एकला'
bahut sunder rachna....
ReplyDeleteबहुत ही बढिया
ReplyDeletebehD achI rchnA..gM b muskuranE lgE h....ptA h aapkO...kL m b likhI eK poeM..
ReplyDeleteबहुत खूब .. गम हमेशा मुस्कुराते हैं .. कुछ होते हैं कुछ दिखाते हैं ...
ReplyDeleteदिल को छूती बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...लाज़वाब
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